परीक्षितगढ़ ये पानी की बौछारें, ये भीगी सी रातें,
आओ मिलकर करें हम ढेरों सारी बातें
गर्मी का किस्सा अब खत्म हुआ यारा,
इस सतरंगी बारिश ने दिल हमारा जीता!
मौसम सुहाना मौसम सुहाना
हां आया है मौसम सुहाना।
दिन के दो बज रहे थे। सूरज देवता आसमान में ऐसे तंग आकर बैठे थे जैसे कोई खड़ूस मकान मालिक हो। पारा 45 डिग्री को पार कर चुका था, और सड़कें इतनी गर्म थीं कि अगर आप उन पर पापड़ रख देते, तो वो बिना तेल के ही तल जाते। लोग घरों में दुबके हुए थे, कूलर घर्र-घर्र' करके अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था और पंखे से सिर्फ 'गर्म हवा के थपेड़े' आशीर्वाद में मिल रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरी कायनात ने मिलकर हमें 'तंदूरी चिकन' बनाने की कसम खा ली हो।
तभी अचानक सीन बदला
द थ्रिलर एंट्री: बादलों का स्वैग।
पश्चिम की तरफ से काले बादलों की एक पूरी पलटन अपनी 'बुलेट' स्टार्ट करके आई। आसमान में एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई धड़ाम
ऐसा लगा जैसे ऊपर वाले ने थियेटर का साउंड सिस्टम फुल कर दिया हो। हवा ने अपनी दिशा बदली। जो हवा दो मिनट पहले तक 'लपट' मार रही थी, वो अचानक मखमली और ठंडी हो गई।
लोग खिड़कियों से बाहर झांकने लगे। चिड़ियों ने चहचहाना शुरू किया, और मोहल्ले के शर्मा जी, जो पिछले तीन घंटे से बनियान पहने एसी के ठीक नीचे चिपके हुए थे, बालकनी की तरफ भागे।
और शुरू हुआ जलवा
फिर गिरी पहली बूंद टप
मिट्टी से वो सोंधी-सोंधी खुशबू उठी, जिसके आगे दुनिया के सारे महंगे परफ्यूम सब) फेल हैं। और फिर जो हुआ, उसे राहत नहीं, 'जन्नत का वीसा' कहते हैं।
सड़कों का मेकओवर: सूखी, तपती हुई सड़कें ऐसे धुलने लगीं जैसे उनका पार्लर में 'हाइड्रा फेशियल' चल रहा हो।
बच्चों का गदर मम्मी की सारी पाबंदियां टूट गईं। बच्चे घर की छतों पर 'छपाक-छपाक' करने कूद पड़े।
कूलर-एसी को मिला वीआरएस: जो एसी सुबह से 'किरकिर' कर रहा था, उसे शांति से सुला दिया गया। खिड़कियां खोल दी गईं ताकि कुदरत की नेचुरल एयर कंडीशनिंग का मजा लिया जा सके।
चाय, पकौड़े और 'सुकून'
इस बारिश ने सिर्फ मौसम नहीं बदला, इंसानों के जज्बात बदल दिए। आधे घंटे की झमाझम बारिश के बाद, जो लोग गर्मी के मारे एक-दूसरे को काटने दौड़ रहे थे, वो अब मुस्कुरा रहे थे।
मोहल्ले की नुक्कड़ वाली दुकान पर कढ़ाई चढ़ चुकी थी। प्याज के पकौड़े तेल में छन रहे थे और अदरक वाली कड़क चाय के कुल्हड़ हवा में लहरा रहे थे।
आसमान ने ऐसा 'कूलर' चलाया कि सीधे रूह तक ठंडक पहुंच गई। अब बस हाथ में चाय का कप है, खिड़की से आती ठंडी बौछारें हैं, और दिल सिर्फ एक ही बात गा रहा हैऑल इज़ वेल।