लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) द्वारा उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) के आदेश के विरुद्ध अपीलीय विद्युत न्यायाधिकरण (APTEL) में दायर अपील को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष एवं देश की सर्वोच्च सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि APTEL में इस मामले की सुनवाई अगस्त के दूसरे सप्ताह में प्रस्तावित है। सवाल यह है कि UPERC द्वारा लगाई गई ₹7.18 लाख की पेनल्टी से बचने के लिए UPPCL अब APTEL में मुकदमे पर फीस सहित अन्य सभी खर्चों को मिलाकर ₹10 लाख से अधिक खर्च करने की तैयारी क्यों कर रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार का उपभोक्ता उत्पीड़न पर पेनल्टी बचाने के लिए चुप्पी भी सवालों के घेरे में है?
उन्होंने कहा कि यदि UPERC के आदेश के अनुसार पेनल्टी जमा होती है तो यह राशि सरकार के खजाने में जाएगी, लेकिन उसे रोकने के लिए सार्वजनिक धन से पेनल्टी राशि से भी अधिक खर्च किया जाना गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक सवाल खड़े करता है।
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि यह मामला केवल ₹7.18 लाख की पेनल्टी का नहीं है, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों, नियामक आयोग के आदेशों के सम्मान और बिजली कंपनियों की जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। UPERC ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर उपभोक्ताओं को निर्धारित समय के भीतर बिजली आपूर्ति बहाल न किए जाने और उपभोक्ता सेवा मानकों के उल्लंघन के मामले में यह कार्रवाई की थी।
उन्होंने कहा कि जिस मामले में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए नियामक आयोग ने कार्रवाई की, उसी आदेश को चुनौती देने के लिए उपभोक्ताओं के पैसे से महंगा कानूनी खर्च किया जाना उचित नहीं है। सरकार को यह देखना होगा कि सार्वजनिक धन का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है और इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी।
परिषद ने फिर दोहराया कि UPPCL के चेयरमैन और अपर मुख्य सचिव (ऊर्जा) के पदों को अलग-अलग किया जाना चाहिए। जब दोनों महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां एक ही स्तर पर केंद्रित रहती हैं तो पारदर्शिता, स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही पर प्रश्न उठते हैं।
अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि सरकार को इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उपभोक्ताओं के धन का उपयोग उपभोक्ता हितों के विरुद्ध कानूनी लड़ाइयों में न किया जाए। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि यदि नियामक आयोग के आदेशों का पालन नहीं किया जाता है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित की जाए।
उन्होंने कहा कि यह मामला प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के अधिकारों से जुड़ा है और इससे स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि उपभोक्ता सेवा मानकों का उल्लंघन और नियामक आदेशों की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी।